1 जो आशीर्वाद परमेश्वर के जन मूसा ने अपनी मृत्यु से पहले इस्राएलियों को दिया वह यह है।
3वह निश्चय लोगों से प्रेम करता है;
4मूसा ने हमें व्यवस्था दी, और वह याकूब की मण्डली का निज भाग ठहरी।
5जब प्रजा के मुख्य-मुख्य पुरुष, और इस्राएल के सभी गोत्र एक संग होकर एकत्रित हुए,
6 “रूबेन न मरे, वरन् जीवित रहे, तो भी उसके यहाँ के मनुष्य थोड़े हों।”
7 और यहूदा पर यह आशीर्वाद हुआ जो मूसा ने कहा,
8 फिर लेवी के विषय में उसने कहा,
9उसने तो अपने माता-पिता के विषय में कहा, 'मैं उनको नहीं जानता;'
10वे याकूब को तेरे नियम, और इस्राएल को तेरी व्यवस्था सिखाएँगे;
11हे यहोवा, उसकी सम्पत्ति पर आशीष दे, और उसके हाथों की सेवा को ग्रहण कर;
12 फिर उसने बिन्यामीन के विषय में कहा,
13 फिर यूसुफ के विषय में उसने कहा;
14और सूर्य के पकाए हुए अनमोल फल,
15और प्राचीन पहाड़ों के उत्तम पदार्थ,
16और पृथ्वी और जो अनमोल पदार्थ उसमें भरें हैं,
17वह प्रतापी है, मानो गाय का पहलौठा है, और उसके सींग जंगली बैल के से हैं;
18 फिर जबूलून के विषय में उसने कहा,
19वे देश-देश के लोगों को पहाड़ पर बुलाएँगे;
20 फिर गाद के विषय में उसने कहा,
21और उसने पहला अंश तो अपने लिये चुन लिया,
22 फिर दान के विषय में उसने कहा,
23 फिर नप्ताली के विषय में उसने कहा,
24 फिर आशेर के विषय में उसने कहा,
25तेरे जूते लोहे और पीतल के होंगे,
26“हे यशूरून, परमेश्वर के तुल्य और कोई नहीं है,
27अनादि परमेश्वर तेरा गृहधाम है,
28और इस्राएल निडर बसा रहता है,
29हे इस्राएल, तू क्या ही धन्य है!