2“चित्त लगाकर मेरी बात सुनो;
3मेरी कुछ तो सहो, कि मैं भी बातें करूँ;
4क्या मैं किसी मनुष्य की दुहाई देता हूँ?
5मेरी ओर चित्त लगाकर चकित हो,
6जब मैं कष्टों को स्मरण करता तब मैं घबरा जाता हूँ,
7क्या कारण है कि दुष्ट लोग जीवित रहते हैं,
9उनके घर में भयरहित कुशल रहता है,
10उनका सांड गाभिन करता और चूकता नहीं,
11वे अपने लड़कों को झुण्ड के झुण्ड बाहर जाने देते हैं,
12वे डफ और वीणा बजाते हुए गाते,
13वे अपने दिन सुख से बिताते,
14तो भी वे परमेश्वर से कहते थे, 'हम से दूर हो!
15सर्वशक्तिमान क्या है, कि हम उसकी सेवा करें?
16देखो, उनका कुशल उनके हाथ में नहीं रहता,
17“कितनी बार ऐसे होता है कि दुष्टों का दीपक बुझ जाता है,
18वे वायु से उड़ाए हुए भूसे की,
19'परमेश्वर उसके अधर्म का दण्ड उसके बच्चों के लिये रख छोड़ता है,'
20दुष्ट अपना नाश अपनी ही आँखों से देखे,
21क्योंकि जब उसके महीनों की गिनती कट चुकी,
22क्या परमेश्वर को कोई ज्ञान सिखाएगा?
23कोई तो अपने पूरे बल में
25और कोई अपने जीव में कुढ़कुढ़कर बिना सुख
26वे दोनों बराबर मिट्टी में मिल जाते हैं,
27“देखो, मैं तुम्हारी कल्पनाएँ जानता हूँ,
28तुम कहते तो हो, 'रईस का घर कहाँ रहा?
29परन्तु क्या तुम ने बटोहियों से कभी नहीं पूछा?
30कि विपत्ति के दिन के लिये दुर्जन सुरक्षित रखा जाता है;
31उसकी चाल उसके मुँह पर कौन कहेगा? और
32तो भी वह कब्र को पहुँचाया जाता है,
33नाले के ढेले उसको सुखदायक लगते हैं;
34तुम्हारे उत्तरों में तो झूठ ही पाया जाता है,