1दाखमधु ठट्ठा करनेवाला और मदिरा हल्ला मचानेवाली है;
2राजा का क्रोध, जवान सिंह के गर्जन समान है;
3मकद्दमें से हाथ उठाना, पुरुष की महिमा ठहरती है;
4आलसी मनुष्य शीत के कारण हल नहीं जोतता;
5मनुष्य के मन की युक्ति अथाह तो है,
6बहुत से मनुष्य अपनी निष्ठा का प्रचार करते हैं;
7वह व्यक्ति जो अपनी सत्यनिष्ठा पर चलता है,
8राजा जो न्याय के सिंहासन पर बैठा करता है,
9कौन कह सकता है कि मैंने अपने हृदय को पवित्र किया;
10घटते-बढ़ते बटखरे और घटते-बढ़ते नपुए इन दोनों से यहोवा घृणा करता है।
11लड़का भी अपने कामों से पहचाना जाता है,
12सुनने के लिये कान और देखने के लिये जो आँखें हैं,
13नींद से प्रीति न रख, नहीं तो दरिद्र हो जाएगा;
14मोल लेने के समय ग्राहक, “अच्छी नहीं, अच्छी नहीं,” कहता है;
15सोना और बहुत से बहुमूल्य रत्न तो हैं;
16किसी अनजान के लिए जमानत देनेवाले के वस्त्र ले और पराए के प्रति जो उत्तरदायी हुआ है उससे बंधक की वस्तु ले रख।
17छल-कपट से प्राप्त रोटी मनुष्य को मीठी तो लगती है,
18सब कल्पनाएँ सम्मति ही से स्थिर होती हैं;
19जो लुतराई करता फिरता है वह भेद प्रगट करता है;
20जो अपने माता-पिता को कोसता,
21जो भाग पहले उतावली से मिलता है,
22मत कह, “मैं बुराई का बदला लूँगा;”
23घटते बढ़ते बटखरों से यहोवा घृणा करता है,
24मनुष्य का मार्ग यहोवा की ओर से ठहराया जाता है;
25जो मनुष्य बिना विचारे किसी वस्तु को पवित्र ठहराए,
26बुद्धिमान राजा दुष्टों को फटकता है,
27मनुष्य की आत्मा यहोवा का दीपक है;
28राजा की रक्षा कृपा और सच्चाई के कारण होती है,
29जवानों का गौरव उनका बल है,
30चोट लगने से जो घाव होते हैं, वे बुराई दूर करते हैं;