1क्या ही धन्य है वह जिसका अपराध
2क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म
4क्योंकि रात-दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा;
5जब मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया
6इस कारण हर एक भक्त तुझ से ऐसे समय
7तू मेरे छिपने का स्थान है;
8मैं तुझे बुद्धि दूँगा, और जिस मार्ग में तुझे
9तुम घोड़े और खच्चर के समान न बनो जो समझ नहीं रखते,
10दुष्ट को तो बहुत पीड़ा होगी;
11हे धर्मियों यहोवा के कारण आनन्दित