प्रसंग 71 का सारांश: प्रसंग 71 वह एक प्रार्थना है जिसमें एक वयस्क विश्वासी भक्त ईश्वर से अपने शत्रुओं से सुरक्षा और मुक्ति की प्रार्थना करता है। प्रसंगकर्ता उसे उसके भूतकाल में मुक्ति के लिए प्रशंसा करता है और भविष्य की सुरक्षा के लिए उसपर अपना विश्वास डालता है। वह अपनी बूढ़पे में उसके साथ रहने के लिए ईश्वर की कृपा की प्रार्थना करता है और सदैव उसकी प्रशंसा करने का व्रत लेता है।
1 हे यहोवा, मैं तेरा शरणागत हूँ;
2तू तो धर्मी है, मुझे छुड़ा और मेरा उद्धार कर;
3मेरे लिये सनातन काल की चट्टान का धाम बन, जिसमें मैं नित्य जा सकूँ;
4हे मेरे परमेश्वर, दुष्ट के
5क्योंकि हे प्रभु यहोवा, मैं तेरी ही बाट जोहता आया हूँ;
6मैं गर्भ से निकलते ही, तेरे द्वारा सम्भाला गया;
7मैं बहुतों के लिये चमत्कार बना हूँ;
8मेरे मुँह से तेरे गुणानुवाद,
9बुढ़ापे के समय मेरा त्याग न कर;
10क्योंकि मेरे शत्रु मेरे विषय बातें करते हैं,
11परमेश्वर ने उसको छोड़ दिया है;
12हे परमेश्वर, मुझसे दूर न रह;
13जो मेरे प्राण के विरोधी हैं, वे लज्जित हो
14मैं तो निरन्तर आशा लगाए रहूँगा,
15मैं अपने मुँह से तेरे धर्म का,
16मैं प्रभु यहोवा के पराक्रम के कामों का वर्णन करता हुआ आऊँगा,
17हे परमेश्वर, तू तो मुझ को बचपन ही से सिखाता आया है,
18इसलिए हे परमेश्वर जब मैं बूढ़ा हो जाऊँ
19हे परमेश्वर, तेरा धर्म अति महान है।
भजन - Bhajan 71:20 - तूने तो हमको बहुत से कठिन कष्ट दिखाए हैं