प्रार्थना के बारे में बाइबल क्या कहती है?

प्रार्थना पर प्रमुख शास्त्र और आध्यात्मिक मार्गदर्शन

बाइबिल बहुत से स्थानों पर प्रार्थना के विषय में बात करती है। प्रार्थना एक महत्वपूर्ण तरीका है जिससे हम अपनी आत्मा की आराम और ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं और परमेश्वर के साथ संबंध को मजबूत कर सकते हैं। प्रार्थना के माध्यम से हम अपनी आत्मिक आवश्यकताओं और समस्याओं को परमेश्वर के सामने रख सकते हैं और उनसे मदद मांग सकते हैं।

प्रार्थना के बारे में बाइबल के पद

फिलिप्पियों 4:6ERV

“किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्‍वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।”

१ थिस्सलोनिकियों का पहला पत्रिका 5:16–18ERV

“सदा आनन्दित रहो। निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो। हर बात में धन्यवाद करो: क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्‍वर की यहीं इच्छा है।”

याकूब 5:16ERV

“इसलिए तुम आपस में एक दूसरे के सामने अपने-अपने पापों को मान लो; और एक दूसरे के लिये प्रार्थना करो, जिससे चंगे हो जाओ; धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है।”

मत्ती की बाइबिल 6:6ERV

“परन्तु जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर; और तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा।”

मार्क ग्रंथ 11:24ERV

“इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो तो विश्वास कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।”

1 पतरसीya वाचन 5:7ERV

“अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है।”

भजन - Bhajan 145:18ERV

“जितने यहोवा को पुकारते हैं, अर्थात् जितने उसको सच्चाई से पुकारते है;”

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