मार्क ग्रंथ 9:43
“यदि तेरा हाथ तुझे ठोकर खिलाएँ तो उसे काट डाल टुण्डा होकर जीवन में प्रवेश करना, तेरे लिये इससे भला है कि दो हाथ रहते हुए नरक के बीच उस आग में डाला जाए जो कभी बुझने की नहीं।”
संदर्भ: मार्क ग्रंथ 9
41जो कोई एक कटोरा पानी तुम्हें इसलिए पिलाए कि तुम मसीह के हो तो मैं तुम से सच कहता हूँ कि वह अपना प्रतिफल किसी तरह से न खोएगा।”
42“जो कोई इन छोटों में से जो मुझ पर विश्वास करते हैं, किसी को ठोकर खिलाएँ तो उसके लिये भला यह है कि एक बड़ी चक्की का पाट उसके गले में लटकाया जाए और वह समुद्र में डाल दिया जाए।
43यदि तेरा हाथ तुझे ठोकर खिलाएँ तो उसे काट डाल टुण्डा होकर जीवन में प्रवेश करना, तेरे लिये इससे भला है कि दो हाथ रहते हुए नरक के बीच उस आग में डाला जाए जो कभी बुझने की नहीं।
44जहाँ उनका कीड़ा नहीं मरता और आग नहीं बुझती।
45और यदि तेरा पाँव तुझे ठोकर खिलाएँ तो उसे काट डाल। लँगड़ा होकर जीवन में प्रवेश करना तेरे लिये इससे भला है, कि दो पाँव रहते हुए नरक में डाला जाए।
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उपन्यास: यीशु पीटर, जेम्स, और जॉन के सामने परागमन में प्रकट होते हैं और आस्था के महत्व के बारे में शिक्षा देते हैं।
व्याख्या
मार्क 9 एक अध्याय है जो विश्वास की शक्ति और प्रार्थना के महत्व पर केंद्रित है। यीशु अपने शिष्यों को विश्वास की शक्ति के बारे में सिखा रहे हैं और यह बताते हैं कि यह पर्वतों को हिला सकता है। उन्होंने उन्हें बताया कि यदि उनके पास विश्वास है और संदेह नहीं है, तो वे कुछ भी मांग सकते हैं और उसे मिलेगा। उन्होंने उन्हें चेतावनी दी कि अगर उनके पास विश्वास नहीं है, तो वे कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे।
फिर यीशु एक कहानी सुनाते हैं एक आदमी के बारे में जिसके पास एक सेवक था जिसकी मदद की आवश्यकता थी। उस आदमी ने अपने सेवक से कुछ ले आने के लिए कहा, लेकिन सेवक करने में असमर्थ था। आदमी ने फिर सेवक से कहा कि उसे विश्वास रखना चाहिए और मानना चाहिए कि उसको कर सकता है, और सेवक ने वह कर दिया।