1दुष्ट जन का अपराध उसके हृदय के भीतर कहता है;
2वह अपने अधर्म के प्रगट होने
3उसकी बातें अनर्थ और छल की हैं;
4वह अपने बिछौने पर पड़े-पड़े
5हे यहोवा, तेरी करुणा स्वर्ग में है,
6तेरा धर्म ऊँचे पर्वतों के समान है,
7हे परमेश्वर, तेरी करुणा कैसी अनमोल है!
9क्योंकि जीवन का सोता तेरे ही पास है;
10अपने जाननेवालों पर करुणा करता रह,
11अहंकारी मुझ पर लात उठाने न पाए,
12वहाँ अनर्थकारी गिर पड़े हैं;