उत्पत्ति 18:30
“फिर उसने कहा, “हे प्रभु, क्रोध न कर, तो मैं कुछ और कहूँ: कदाचित् वहाँ तीस मिलें।” उसने कहा, “यदि मुझे वहाँ तीस भी मिलें, तो भी ऐसा न करूँगा।””
संदर्भ: उत्पत्ति 18
28कदाचित् उन पचास धर्मियों में पाँच घट जाएँ; तो क्या तू पाँच ही के घटने के कारण उस सारे नगर का नाश करेगा?” उसने कहा, “यदि मुझे उसमें पैंतालीस भी मिलें, तो भी उसका नाश न करूँगा।”
29फिर उसने उससे यह भी कहा, “कदाचित् वहाँ चालीस मिलें।” उसने कहा, “तो मैं चालीस के कारण भी ऐसा न करूँगा।”
30फिर उसने कहा, “हे प्रभु, क्रोध न कर, तो मैं कुछ और कहूँ: कदाचित् वहाँ तीस मिलें।” उसने कहा, “यदि मुझे वहाँ तीस भी मिलें, तो भी ऐसा न करूँगा।”
31फिर उसने कहा, “हे प्रभु, सुन, मैंने इतनी ढिठाई तो की है कि तुझ से बातें करूँ: कदाचित् उसमें बीस मिलें।” उसने कहा, “मैं बीस के कारण भी उसका नाश न करूँगा।”
32फिर उसने कहा, “हे प्रभु, क्रोध न कर, मैं एक ही बार और कहूँगा: कदाचित् उसमें दस मिलें।” उसने कहा, “तो मैं दस के कारण भी उसका नाश न करूँगा।”
उत्पत्ति 18 के बारे में: इसक की जन्म का वादा।

भागवत गाथा के अध्याय 18 का सारांश: भगवान इब्राहीम के पास आते हैं और उन्हें बताते हैं कि उनकी वृद्धा पत्नी सारा एक पुत्र को जन्म देगी। इब्राहीम हंसते हैं, परंतु सारा गर्भवती हो जाती है और उसे यित्सहक नामक पुत्र की प्रसूति होती है।
व्याख्या
उससे पहले उन तीन आदमियों की यात्रा के बारे में उस यहूदी आदमी इब्राहीम और सारे से बातचीत है जिन्हें बाद में परमेश्वर के दूतों के रूप में पहचाना जाता है और यह बताने के लिए भेजा गया है कि इब्राहीम और सारे का एक पुत्र होगा। यह यहूदी धर्मग्रंथ में महत्वपूर्ण वक्तव्य है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि परमेश्वर ने इब्राहीम को वचन दिया था कि उसे अनेक जातियों का पिता बनाएंगे।