लूका 18:20

“तू आज्ञाओं को तो जानता है: ‘व्यभिचार न करना, हत्या न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, अपने पिता और अपनी माता का आदर करना’।””
— लूका 18:20 (Eliot Indian Bible)

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संदर्भ: लूका 18

18किसी सरदार ने उससे पूछा, “हे उत्तम गुरु, अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूँ?”

19यीशु ने उससे कहा, “तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक, अर्थात् परमेश्‍वर।

20तू आज्ञाओं को तो जानता है: ‘व्यभिचार न करना, हत्या न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, अपने पिता और अपनी माता का आदर करना’।”

21उसने कहा, “मैं तो इन सब को लड़कपन ही से मानता आया हूँ।”

22यह सुन, “यीशु ने उससे कहा, तुझ में अब भी एक बात की घटी है, अपना सब कुछ बेचकर कंगालों को बाँट दे; और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा, और आकर मेरे पीछे हो ले।”

लूका 18 के बारे में: लगातार विधवा की कहानी

लूका 18: लगातार विधवा की कहानी

इस सारांश में यीशु नम्रता और फरीसी और कर-टैक्स कलेक्टर की कहानी के बारे में सिखाते हैं।

व्याख्या

लूका 18 एक अध्याय है जो विश्वास और प्रार्थना की शक्ति पर बोलता है। यीशु एक दृढ़ विधवा का उदाहरण देते हुए कहते हैं, जो न्याय के लिए एक न्यायाधीश से नियंत्रण किसी लगातार याचकॉं का हस्तक्षेप करती है। न्यायाधीश, जो पहले उसकी पीड़ा के प्रति दयालु नहीं था, अंततः उसे इसलिए न्याय देता है क्योंकि वह लगातार रही। फिर यीशु अपने शिष्यों को सिखाते हैं कि अगर एक अधर्मी न्यायाधीश किसी विधवा के दृढ़ता से हिल सकता है, तो फिर भगवान कितने लोगों की प्रार्थनाओं का जवाब देगा।

यीशु उसके द्वारा पुनः एक दूसरी कथा सुनाते हैं जिसमें फरिसी और कर संभालक दोनों मंदिर में प्रार्थना करने जाते हैं। फरिसी अपने अपनी धार्मिकता की भड़काऊ, जबकि कर संभालक विनीतता से अनुग्रह के लिए मांगा करते हैं। यीशु सिखाते हैं कि भगवान के समक्ष एसा संभालक पर प्राप्ति होती है, न कि फरिसी।

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